प्रश्न-गृहस्थका खास धर्म क्या है?



उत्तर—-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-इन चारों आश्रमोंकी सेवा करना गृहस्थका खास धर्म है; क्योंकि गृहस्थ ही सबका माँ-बाप है, पालक है, संरक्षक है अर्थात् गृहस्थसे ही ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी उत्पन्न होते हैं और पालित एवं संरक्षित होते हैं। अत: चारों आश्रमोंका पालन-
पोषण करना गृहस्थका खास धर्म है।
अतिथि-सत्कार करना; गाय-भैंस, भेड़ -बकरी आदिको सुख-सुविधा देना; घरमें रहनेवाले चूहे आदिको भी अपने घरका सदस्य मानना; उन सबका पालन-पोषण करना गृहस्थका खास धर्म है। ऐसे ही देवता, ऋषि-मुनिकी सेवा करना, पितरोॉको
पिण्ड-पानी देना, भगवानूकी विशेषतासे सेवा (भजन-स्मरण) करना गृहस्थका खास धर्म है।


प्रश्न:- गृहस्थाश्रममें कैसे रहना चाहिये?


उत्तर-यह मनुष्य-शरीर और इसमें भी गृहस्थ-आश्रम
उद्धार करनेकी पाठशाला है। भोग भोगने और आराम करनेके लिये यह मनुष्य-शरीर नहीं है। ‘एहि तन कर फल बिषय न
भाई’ (मानस, उत्तर० ४४। १) । शास्त्रविहित यज्ञ आदि कर्म करके ब्रह्मलोक आदि लोकोंकी प्राप्ति करना भी खास बात नहीं है; क्योंकि वहाँ जाकर फिर पीछे लौटकर आना ही पड़ता है-“आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनः” (गीता ८ । १६) । अत: प्राणिमात्रके हितकी भावना रखते हुए गृहस्थ- आश्रममे रहना चाहिये और अपनी शक्तिके अनुसार तन, मन, बुद्धि, योग्यता, अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचाना चाहिये। दूसरोकी
सुख-सुविधाके लिये अपने सुख-आरामका त्याग करना हो मनुष्यकी मनुष्यता है।

प्रश्न-गृहस्थमें काम-धंधा करते हुए जो हिंसा होती है।
उससे छुटकारा कैसे हो ?

उत्तर-गृहस्थमें रोज ये पाँच हिंसाएँ होती हैं- ( १) जहाँ
रसोई बनती है, वहाँ आगमें चींटी आदि छोटे छोटे जीव मरते
हैं, लकड़ियोंमें रहनेवाले जीव मरते हैं, आदि। (२) जहाँ जल
रखते हैं, वहाँ घड़ा इधर-उधर करने आदिसे भी जीव मरते हैं ।
(३) झाड़ु लगाते समय बहुत-से जीव मरते हैं । (४) चक्कीमें
अनाज पीसते समय भी बहुत-से जीव पीसे जाते हैं। (५) ऊखलमें
चावल आदि कूटते समय भी जीव मरते हैं। इन हिंसाओंसे छूटनेके
लिये गृहस्थको प्रतिदिन बलिवैश्वदेव, पंचमहायज्ञ करना चाहिये।
जो सर्वथा भगवान्के ही शरण हो जाता है, उसको यह हिंसा नहीं
लगती। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

प्रश्न-हम चक्की नहीं चलाते, धान नहीं कूटते तो हमें
हिंसा नहीं लगेगी?

उत्तर-आप पीसा हुआ आटा, कूटा हुआ धान अपने
काममें लेते हैं तो उस आटेको पीसनेमें, धानको कूटनेमें जो
हिंसा हुई है, वह आपको लगेगी ही।

प्रश्न-खेतीमें अनेक जीवोंकी हिंसा होती है, तो क्या
किसान खेती न करे?

उत्तर- खेती जरूर करे, पर खयाल रखे कि हिंसा न हो। किसानके लिये खेती करनेका विधान होनेसे उसको पाप कम लगता है, अत: उसको पापसे डरकर अपने कर्तव्यका त्याग नहीं करना चाहिये। हाँ, जहाँतक बने, हिंसा न हो, ऐसी सावधानी अवश्य रखनी चाहिये।


प्रश्न-आजकल किसानलोग फसलकी सुरक्षाके लिये
जहरीली दवाएँ छिड़कते हैं तो क्या यह ठीक है?


उत्तर-किसानको यह काम कभी नहीं करना चाहिये।
पहले लोग ऐसी हिंसा नहीं करते थे तो अनाज सस्ता मिलता था। आजकल हिंसा करते हैं तो अनाज महँगा मिलता है। दीखनेमें तो ऐसा दीखता है कि जीवोंको मार देनेसे अनाज अधिक होता है, पर इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।


प्रश्न-शास्त्रोंमें गृहस्थपर पाँच ऋण बताये गये हैं-
पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण, भूतऋण और मनुष्यऋण । इनमेंसे पितृऋण क्या है और उससे छूटनेका उपाय क्या है?

उत्तर- माता-पिता, दादा-दादी परदादा-परदादी, नाना-
नानी, परनाना-परनानी आदिके मरनेपर जो कार्य किये जाते हैं, वे सब ‘प्रेतकार्य ‘ हैं और परम्परासे श्राद्ध-तर्पण करना, पिण्ड-पानी देना आदि जो कार्य पितरोंके उद्देश्यसे किये जाते हैं, वे सब ‘पितृकार्य’ हैं। मरनेके बाद प्राणी देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, भूत-प्रेत, वृक्ष-लता आदि किसी भी योनिमें चला जाय तो
उसकी ‘पितर’ संज्ञा होती है। माता-पिताके रज-वीर्यसे शरीर बनता है । माताके दूधसे और पिताके कमाये हुए अन्नसे शरीरका पालन-पोषण होता है।
पिताके धनसे शिक्षा एवं योग्यता प्राप्त होती है। माता-पिताके उद्योगसे विवाह होता है। इस तरह पुत्रपर माता-पिताका, माता-पितापर दादा-दादीका और दादा-दादीपर परदादा-परदादीका ऋण रहता है। परम्परासे रहनेवाले इस पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये, पितरोंकी सद्गतिके लिये उनके नामसे पिण्ड-पानी देना चाहिये श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये। पुत्र जन्मभर माता-पिता आदिके नामसे पिण्ड-पानी देता है पर आगे पिण्ड-पानी देनेके लिये सन्तान उत्पन्न नहीं करता तो वह पितृत्ऋणसे मुक्त नहीं होता अर्थात् उसपर पितरोंका ऋण रहता है। परन्तु सन्तान उत्पन्न होनेपर उसपर पितृऋण नहीं रहता. प्रत्युत वह पितृऋण सन्तानपर आ जाता है पितर पिण्ड-पानी
चाहते हैं; अत: पिण्ड-पानी मिलनेसे वे सुखी रहते हैं और न मिलनेसे वे दुःखी हो जाते हैं। पुत्रकी सन्तान न होनेसे भी वे दु:खी हो जाते हैं कि आगे हमें पिण्ड-पानी कौन देगा!

प्रश्न-क्या पितरोंके नामसे दिया हुआ उनको मिल
जाता है?

उत्तर-पितरोंके नामसे जो कुछ दिया जाय, वह सब उनको मिल जाता है। वे चाहे किसी भी योनिमें क्यों न हों, उनके नामसे दिया हुआ पिण्ड-पानी उनको उसी योनिके अनुसार खाद्य या पेय पदार्थके रूपमें मिल जाता है। जैसे, पितर पशुयोनिमें हों तो उनके
नामसे दिया हुआ अन्न उनको घास बनकर मिल जायगा और देवयोनिमें हों तो अमृत बनकर मिल जायगा। तात्पर्य है कि जैसी वस्तुसे उनका निर्वाह होता हो, वैसी वस्तु उनको मिल जाती है।
जैसे हम यहाँसे अमेरिकामें किसीको मनीआर्डरके द्वारा रुपये भेजें तो वे वहाँ डालर बनकर उसको मिल जाते हैं, ऐसे ही हम पितरोंके नामसे पिण्ड-पानी देते हैं, दान-पुण्य करते हैं, तो वह जिस योनिरमें पितर हैं, उसी योनिके अनुसार खाद्य या पेय पदार्थके
रूपमें पितरोंको मिल जाता है।

आज हमें बड़े आदरसे जो रोटी-कपड़ा आदि मिलता है, वह हमारे पूर्वकृत पुण्योंका फल भी हो सकता है और हमारे पूर्वजन्मके पुत्र-पौत्रादिकोंके द्वारा किये हुए श्राद्ध-तर्पणका फल भी हो सकता है, पर है यह हमारा प्रारब्ध ही। जैसे किसीने बैंकमें एक लाख रुपये जमा किये। उनमेंसे उसने कुछ अपने नामसे, कुछ पत्नीके नामसे और कुछ पुत्रके नामसे जमा किये, तो वह अपने नामसे जमा किये हुए पैसे ही निकाल सकता है, अपनी पत्नी और पुत्रके नामसे जमा किये हुए
पैसे नहीं। वे पैसे तो उसकी पत्नी और पुत्रको ही मिलेंगे। ऐसे ही पितरोंके नामसे जो पिण्ड-पानी दिया जाता है, वह पितरोंको ही मिलता है, हमें नहीं। हाँ, हम जीते-जी गयामें जाकर अपने नामसे पिण्ड-पानी देंगे तो मरनेके बाद वह हमें ही मिल जायगा । गयामें तो पशु-पक्षीके नामसे दिया हुआ पिण्ड-पानी भी उनको
मिल जाता है। एक सज्जनका अपनी गायपर बड़ा स्नेह था। वह गाय मर गयी तो वह उसको स्वप्नमें बहुत दुःखी दिखायी दी। उसने गयामें जाकर उस गायके नामसे पिण्ड-पानी दिया। फिर वह गाय स्वप्नमें दिखायी दी तो वह बहुत प्रसन्न थी। जैसे हमारे पास एक तो अपना कमाया हुआ धन है और एक पिता, दादा, परदादाका कमाया हुआ धन है तो अपने
कमाये हुए धनपर ही हमारा अधिकार है; पिता, दादा आदिके कमाये हुए धनपर हमारा उतना अधिकार नहीं है। वंश-परम्पराके अनुसार पिता, दादा आदिके धनपर हमारे पुत्र-पौत्रोंका अधिकार है। ऐसे ही पितरोंको वंश-परम्पराके अनुसार पुत्र पौत्रोंका दिया हुआ पिण्ड-पानी मिलता है। अत: पुत्र-पौत्रोंपर पिता, दादा आदिके पिण्ड-पानी देनेका दायित्व है।
एक पितृलोक भी है, पर मरनेके बाद सब पितृलोकमें ही जाते हों-यह कोई नियम नहीं है। कारण कि अपने-अपने कर्मोके अनुसार ही सबकी गति होती है।


प्रश्न-यदि किसीके माता-पिता (पितर) मुक्त हो गये हैं।
भगवद्धाममें चले गये हैं तो उनके नामसे दिये हुए पिण्ड-पानीका क्या होगा?
उत्तर-पुत्रको तो यह पता नहीं रहता कि मेरे माता-पिता मुक्त हो गये, भगवद्धाममें चले गये; पर वह उनके नामसे आदरपूर्वक जो पिण्ड-पानी देता है, दान-पुण्य करता है, वह सब उसके नामपर जमा हो जाता है और मरनेके बाद उसीको मिल जाता है। जैसे, हम किसीके नामसे बम्बई पैसे भेजते हैं, पर वह
व्यक्ति वहाँ नहीं है तो वे पैसे वापिस हमें ही मिल जाते हैं।


प्रश्न-क्या सन्तान उत्पन्न किये बिना भी मनुष्य पितृऋणसे
छूट सकता है?


उत्तर- हाँ, छूट सकता है। जो भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है, उसपर कोई भी ऋण नहीं रहता-
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥
(श्रीमद्भा० ११। ५ । ४१)
‘राजन्! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान्की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी, कुटुम्बीजन और पितृगण इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक (गुलाम) नहीं रहता ।’

श्रीमद्भगवद्गीता अथ द्वितीयोऽध्यायः

सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
संजय बोले-उस प्रकार करुणासे व्याप्त और
आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्त
उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदनने यह वचन
कहा॥ १॥

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
श्रीभगवान् बोले- हे अर्जुन ! तुझे इस असमयमें
यह मोह किस हेतुसे प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो
यह श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित है, न स्वर्गको देनेवाला
है और न कीर्तिको करनेवाला ही है ॥ २ ॥

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
इसलिये हे अर्जुन ! नपुंसकताको मत प्राप्त हो,
तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप!
हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको त्यागकर युद्धके लिये
खड़ा हो जा॥ ३॥

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सड्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाह्हावरिसूदन॥
अर्जुन बोले-हे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें किस प्रकार
बाणोंसे भीष्मपितामह और द्रोणाचार्यके विरुद्ध लड़ँगा ?
क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं॥४॥

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
ज्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
इसलिये इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं
इस लोकमें भिक्षाका अन्न भी खाना कल्याणकारक
समझता हूँ; क्योंकि गुरुजनोंको मारकर भी इस
लोकमें रुधिरसे सने हुए अर्थ और कामरूप
भोगोंको ही तो भोगूँगा ॥ ५ ॥

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध
करना और न करना-इन दोनोंमेंसे कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे
हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम
जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय
धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे मुकाबलेमें खड़े हैं ॥ ६ ॥

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यात्रिश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला
तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता
हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे
लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये
आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये ॥ ७ ॥

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धंराज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
क्योंकि भूमिमें निष्कण्टक, धन-धान्यसम्पन्न
राज्यको और देवताओंके स्वामीपनेको प्राप्त होकर
भी मैं उस उपायको नहीं देखता हूँ, जो मेरी
इन्द्रियोंके सुखानेवाले शोकको दूर कर सके॥ ८ ॥

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूण्ण्णी बभूव ह ॥
संजय बोले-हे राजन्| निद्राको जीतनेवाले
अर्जुन अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराजके प्रति इस
प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्दभगवान्से ‘युद्ध नहीं
कँगा’ यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये॥ ९ ॥

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्रिव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: ॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज
दोनों सेनाओंके बीचमें शोक करते हुए उस अर्जुनको
हँसते हुए-से यह वचन बोले॥ १० ॥

श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
श्रीभगवान् बोले-हे अर्जुन ! तू न शोक करनेयोग्य
मनुष्योंके लिये शोक करता है और पण्डितोंके-से
वचनोंको कहता है; परंतु जिनके प्राण चले गये हैं,
उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके
लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते॥ ११॥

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी कालमें नहीं था,
नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न
ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे॥ १२ ॥

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन, जवानी
और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीरकी
प्राप्ति होती है; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं
होता ॥ १३ ॥

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखको
देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-
विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत !
उनको तू सहन कर॥१४॥

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख-सुखको समान समझनेवाले जिस धीर पुरुषको ये इन्द्रिय और
विषयोंके संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्षके
योग्य होता है॥ १५ ॥

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः
असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सतका
अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्व
तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है ॥ १६ ॥

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण
जगत्-दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश
करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्माके
ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे।
भरतवंशी अर्जुन ! तू युद्ध कर ॥ १८ ॥

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते;
क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको
मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है ॥ १९ ॥

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
यह आत्मा किसी कालमें भी न तो जन्मता है।
और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर
होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य,
सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी
यह नहीं मारा जाता॥ २० ॥


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥
हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्माको नाशरहित,
नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे
किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है ? ॥ २१ ॥


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नये
वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरोंको त्यागकर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है ॥ २२ ॥


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
इस आत्माको शस्त्र नहीं काट सकते, इसको
आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला
सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥ २३॥


अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा
अदाह्य, अक्लेद्य और निःसन्देह अशोष्य है तथा
यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर
रहनेवाला और सनातन है॥ २४॥


अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है।
और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है । इससे
हे अर्जुन ! इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जानकर
तू शोक करनेको योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक
करना उचित नहीं है ॥ २५ ॥

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥
किन्तु यदि तू इस आत्माको सदा जन्मनेवाला
तथा सदा मरनेवाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो!
तू इस प्रकार शोक करनेको योग्य नहीं है ॥ २६ ॥


जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जन्मे हुएकी
मृत्यु निश्चित है और मरे हुएका जन्म निश्चित है।
इससे भी इस बिना उपायवाले विषयमें तू शोक
करनेको योग्य नहीं है ॥ २७ ॥


अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट
थे और मरनेके बाद भी अप्रकट हो जानेवाले हैं,
केवल बीचमें ही प्रकट हैं; फिर ऐसी स्थितिमें क्या
शोक करना है ? ॥ २८॥


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ कोई एक महापुरुष ही इस आत्माको आश्चर्यकी
भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष
ही इसके तत्त्वका आश्चर्यकी भाँति वर्णन करता
है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे
आश्चर्यकी भाँति सुनता है और कोई-कोई तो
सुनकर भी इसको नहीं जानता॥ २९ ॥


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरोंमें सदा ही
अवध्य* है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू
शोक करनेके योग्य नहीं है ॥ ३० ॥


स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धम्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
तथा अपने धर्मको देखकर भी तू भय करनेयोग्य
नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिये;
क्योंकि क्षत्रियके लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर
दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है ॥ ३१ ॥


यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए
जिसका वध नहीं किया जा सके। स्वर्गके द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान्
क्षत्रियलोग ही पाते हैं॥ ३२ ॥


अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्धको नहीं करेगा
तो स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त
होगा॥ ३३ ॥


अकीर्ति चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते ॥
तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली
अपकीर्तिका भी कथन करेंगे और माननीय पुरुषके
लिये अपकीर्ति मरणसे भी बढ़कर है॥ ३४ ॥


भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥ और जिनकी दृष्टिमें तू पहले बहुत सम्मानित
होकर अब लघुताको प्राप्त होगा, वे महारथीलोग
तुझे भयके कारण युद्धसे हटा हुआ मानेंगे ॥ ३५॥


अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ तेरे वैरीलोग तेरे सामर्थ्यकी निन्दा करते हाए
तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे.
उससे अधिक दुःख और क्या होगा? ॥ ३६ ॥


हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गजित्वा वा भोक्ष्यसेमहीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥
या तो तू युद्धमें मारा जाकर स्वर्गको प्राप्त होगा
अथवा संग्राममें जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा ।
इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिये निश्चय करके
खड़ा हो जा॥ ३७॥


सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान
समझकर, उसके बाद युद्धके लिये तैयार हो जा; इस
प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा॥ ३८ ॥


एषा तेऽभिहिता साड्ख्ये बुद्धिर्योंगे त्विमां शृणु।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
हे पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोगके
विषयमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोगके
विषयमें सुन-जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू
कर्मोंके बन्धनको भलीभाँति त्याग देगा अर्थात् सर्वथा
नष्ट कर डालेगा॥ ३९॥


नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
इस कर्मयोगमें आरम्भका अर्थात् बीजका नाश
नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि
इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-
मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है ॥ ४० ॥


व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयो ऽव्यवसायिनाम् ॥
हे अर्जुन ! इस कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धि
एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन
सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली
और अनन्त होती हैं॥ ४१ ॥


यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
हे अर्जुन ! जो भोगोंमें तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफलके प्रशंसक वेदवाक्योंमें ही प्रीति रखते
हैं, जिनकी बुद्धिमें स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु
है और जो स्वर्गसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु
ही नहीं है -ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन
इस प्रकारकी जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ
शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं जो कि
जन्मरूप कर्मफल देनेवाली एवं भोग तथा ऐश्वर्यकी
प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी बहुत-सी क्रियाओंका
वर्णन करनेवाली है, उस वाणीद्वारा जिनका चित्त
हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त
आसक्त हैं; उन पुरुषोंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका
बुद्धि नहीं होती॥४२-४४॥


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वनद्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकारसे तीनों गुणोंके
कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनोंका
प्रतिपादन करनेवाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं
उनके साधनोंमें आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे
रहित, नित्यवस्तु परमात्मामें स्थित, योग?-क्षेमको’ न चाहनेवाला और स्वाधीन अन्तः-करणवाला
हो॥ ४५ ॥


यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर
छोटे जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता
है, ब्रह्मको तत्त्वसे जाननेवाले ब्राह्मणका समस्त
वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रह जाता है ॥ ४६ ॥


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भू्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है, उसके फलोंमें
कभी नहीं। इसलिये तू कर्मोके फलका हेतु मत हो
तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो ॥ ४७ ॥


योगस्थः कुरु कर्माणि सड्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
हे धनञ्जय! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि
और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें
स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोको कर, समत्व * ही योग
कहलाता है॥ ४८॥

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त
ही निम्न श्रेणीका है। इसलिये हे धनङ्जय! तू
समबुद्धिमें ही रक्षाका उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोगका
ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले
अत्यन्त दीन हैं ॥ ४९ ॥


बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको
इसी लोकमें त्याग देता है अर्थात् उनसे मुक्त हो
जाता है। इससे तू समत्वरूप योगमें लग जा; यह
समत्वरूप योग ही कर्मोंमें कुशलता है अर्थात्
कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है॥ ५० ॥


कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥
क्योंकि समबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन कर्मोंसे उत्पन्न
होनेवाले फलको त्यागकर जन्मरूप बन्धनसे मुक्त
हो निर्विकार परमपदको प्राप्त हो जाते हैं॥ ५१ ॥


यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ जिस कालमें तेरी बुद्धि मोहरूप दलदलको
भलीभाँति पार कर जायगी, उस समय तू सुने हुए
और सुननेमें आनेवाले इस लोक और परलोकसम्बन्धी
सभी भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा ॥ ५२ ॥


श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
भाँति-भाँतिके वचनोंको सुननेसे विचलित हुई
तेरी बुद्धि जब परमात्मामें अचल और स्थिर ठहर
जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा अर्थात्
तेरा परमात्मासे नित्य संयोग हो जायगा ॥ ५३ ॥


अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
अर्जुन बोले-हे केशव! समाधिमें स्थित
परमात्माको प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुषका क्या
लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है,
कैसे बैठता है और कैसे चलता है ? ॥ ५४॥


श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।॥श्रीभगवान् बोले-हे अर्जुन ! जिस कालमें यह
पुरुष मनमें स्थित सम्पूर्ण कामनाओंको भलीभाँति
त्याग देता है और आत्मासे आत्मामें ही संतुष्ट रहता
है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥ ५५॥


दुःखेष्वनुद्विग्रमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्देग
नहीं होता, सुखोंकी प्राप्तिमें जो सर्वथा नि:स्पृह है।
तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं,
ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है ॥ ५६॥


यः सर्वत्रानभिस्त्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ
या अशुभ वस्तुको प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है।
और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है ॥ ५७ ॥


यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
और कछुवा सब ओरसे अपने अंगोंको जैसे
समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियोंके
विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिये) ॥ ५८ ॥


विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्टा निवर्तते ॥
इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले
पुरुषके भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं,
परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती।
इस स्थितप्रज्ञ पुरुषकी तो आसक्ति भी परमात्माका
साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है ॥ ५९ ॥


यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चिचतः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
हे अर्जुन ! आसक्तिका नाश न होनेके कारण
ये प्रमथनस्वभाववाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुषके मनको भी बलात् हर लेती हैं ॥ ६० ॥


तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
इसलिये साधकको चाहिये कि वह उन सम्पूर्ण
इन्द्रियोंको वशमें करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण
होकर ध्यानमें बैठे, क्योंकि जिस पुरुषकी इन्द्रयाँ
वशमें होती हैं, उसीकी बुद्धि स्थिर हो जाती है ॥ ६१ ॥


ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें
आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी
कामना उत्पन्न होती है और कामनामें विघ्न
पड़नेसे क्रोध उत्पन्न होता है॥ ६२ ॥


क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
क्रोधसे अत्यन्त मूढभाव उत्पन्न हो जाता है,
मूढ़भावसे स्मृतिमें भ्रम हो जाता है, स्मृतिमें भ्रम
हो जानेसे बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश हो
जाता है और बुद्धिका नाश हो जानेसे यह पुरुष
अपनी स्थितिसे गिर जाता है ॥ ६३ ॥


रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
परंतु अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला
साधक अपने वशमें की हुई, राग-द्वेषसे रहित
इन्द्रियोंद्वारा विषयोंमें विचरण करता हुआ अन्त:करणकी प्रसन्नताको प्राप्त होता है ॥ ६४॥


प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
अन्त:करणकी प्रसन्नता होनेपर इसके सम्पूर्ण
दुःखोंका अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवालेकर्मयोगीकी बुद्धि शीघ्र ही सब ओरसे हटकर एक परमात्मामें ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है ॥ ६५॥


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
न जीते हुए मन और इन्द्रियोंवाले पुरुषमें
निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त
मनुष्यके अन्त:करणमें भावना भी नहीं होती तथा
भावनाहीन मनुष्यको शान्ति नहीं मिलती और
शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता
है? ॥ ६६ ॥


इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुनर्नावमिवाम्भसि ॥
क्योंकि जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु
हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे
मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है वह एक ही इन्द्रिय
इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है॥ ६७ ॥


तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
इसलिये हे महाबाहो! जिस पुरुषकी इन्द्रियाँ
इन्द्रियोंके विषयोंसे सब प्रकार निग्रह की हुई हैं,
उसीकी बुद्धि स्थिर है॥ ६८ ॥

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भृतानि सा निशा पश्यतो मुने: ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो रात्रिके समान है,
उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्दकी प्राप्तिमें स्थितप्रज्ञ
योगी जागता है और जिस नाशवान् सांसारिक
सुखकी प्राप्तिमें सब प्राणी जागते हैं, परमात्माके
तत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये वह रात्रिके
समान है॥ ६९ ॥


आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाण्नोति न कामकामी ॥
जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण,
अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न
करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस
स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न
किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशान्तिको
प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं ॥ ७० ॥


विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है,
वही शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको
प्राप्त है॥ ७१ ॥


एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥
हे अर्जुन! यह ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषकी
स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित
नहीं होता और अन्तकालमें भी इस ब्राह्मी स्थितिमें
स्थित होकर ब्रह्मानन्दको प्राप्त हो जाता है॥ ७२ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्म-
विद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥

।। श्रीमद्भगवद्गीता अथ प्रथमोध्याय:।।

धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक:- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
अर्थ–धृतराष्ट्र बोले-हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें
एकत्रित, युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके
पूत्रोंने क्या किया? ॥१॥

सञ्जय उवाच
श्लोक:- दृष्टा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
अर्थ–संजय बोले-उस समय राजा दुर्योधनने
व्यूहरचनायुक्त पाण्डवोंकी सेनाको देखकर और
द्रोणाचार्यके पास जाकर यह वचन कहा ॥२॥


श्लोक:- पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
अर्थ–हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र
धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रोंकी
इस बड़ी भारी सेनाको देखिये ॥३॥

श्लोक:- अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
ययुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
अर्थ–इस सेनामें बड़े-बड़े धनुषोंवाले तथा युद्ध में
भीम और अर्जुनके समान शूरवीर सात्यकि और
विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और
चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज
और मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा
बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदीके
पाँचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं॥४-६॥


श्लोक:- अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते॥
अर्थ– हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने पक्षमें भी जो प्रधान हैं, उनको
आप समझ लीजिये। आपकी जानकारीके लिये मेरी
सेनाके जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ॥७॥


श्लोक:- भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥ अर्थ–आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण
और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा,
विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा ॥ ८॥


श्लोक:- अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
अर्थ– और भी मेरे लिये जीवनकी आशा त्याग देनेवाले
बहत-से शूरवीर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित और सब-के-सब युद्धमें चतुर हैं ॥९॥


श्लोक:- अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
अर्थ–भीष्मपितामहद्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब
प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन लोगोंकी
यह सेना जीतनेमें सुगम है॥१०॥


श्लोक:- अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
अर्थ–इसलिये सब मोर्चोंपर अपनी-अपनी जगह
स्थित रहते हुए आपलोग सभी निःसन्देह
भीष्मपितामहकी ही सब ओरसे रक्षा करें॥११॥


श्लोक:- तस्य सञ्जनयन् हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ।।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान्॥ अर्थ–कौरवोंमें वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्मने उस
दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वरसे
सिंहकी दहाड़के समान गरजकर शंख बजाया ॥ १२॥


श्लोक:- ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा:।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
अर्थ–इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल,
मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज
उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयकर हुआ॥ १३ ॥


श्लोक:- ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थित।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खी प्रदध्मतुः ॥
अर्थ–इसके अनन्तर सफेद घोड़ोंसे युक्त उत्तम रथमें
बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुनने भी अलौकिक
शंख बजाये ॥ १४॥


श्लोक:- पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्डूं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥
अर्थ–श्रीकृष्ण महाराजने पाञ्चजन्यनामक, अर्जुनने
देवदत्तनामक और भयानक कर्मवाले भीमसेनने
पौण्डूनामक महाशंख बजाया ॥ १५ ॥


श्लोक:- अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ अर्थ–कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजयनामक
और नकुल तथा सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पकनामक शंख बजाये ॥ १६॥


श्लोक:- काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥
द्रूपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक्॥
अर्थ–श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि,
राजा द्रुपद एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले
सुभद्रापुत्र अभिमन्यु-इन सभीने, हे राजन् ! सब
ओरसे अलग-अलग शंख बजाये ॥ १७-१८॥


श्लोक:- स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥
अर्थ–और उस भयानक शब्दने आकाश और पृथ्वीको
भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रोंके अर्थात् आपके पक्षवालोंकि
हृदय विदीर्ण कर दिये॥ १९ ॥


श्लोक:- अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्रा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥
अर्थ–हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुनने मोर्चा
बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको देखकर, उस
शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय धनुष उठाकर हृषीकेश
श्रीकृष्ण महाराजसे यह वचन कहा-हे अच्युत! मेरे
रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये ॥ २०-२१ ॥


श्लोक:- यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥
अर्थ–और जबतक कि मैं युद्धक्षेत्रमें डटे हुए युद्धके
अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओंको भलीप्रकार देख
लूँ कि इस युद्धरूप व्यापारमें मुझे किन-किनके साथ
युद्ध करना योग्य है तबतक उसे खड़ा रखिये ॥ २२॥


श्लोक:- योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥
अर्थ–दुर्बुद्धि दुर्योधनका युद्धमें हित चाहनेवाले जो-
जो ये राजा लोग इस सेनामें आये हैं, इन युद्ध
करनेवालोंको मैं देखूँगा ॥ २३ ॥


सञ्जय उवाच
श्लोक:- एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥
अर्थ–संजय बोले-हे धृतराष्ट्र ! अर्जुनद्वारा इस प्रकार कहे
हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्रने दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके सामने तथा सम्पूर्ण राजाओंके सामने उत्तम रथको खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये जुटे हुए इन कौरवोंको देख ॥ २४-२५॥

श्लोक:- तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितृनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्ध्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
अर्थ–इसके बाद पृथापुत्र अर्जुनने उन दोनों ही
सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचोंको, दादों-परदादोंको,
गुरुओंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको
तथा मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृदोंको भी देखा ॥ २६ और २७वेंका पूर्वार्ध ॥


श्लोक:- तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
अर्थ–उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओंको देखकर वे कुन्तीपुत्र
अर्जुन अत्यन्त करुणासे युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले ॥ २७ वेंका उत्तरार्ध और २८ वेंका पूर्वार्ध ॥

अर्जुन उवाच
श्लोक:- दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
अर्थ–अर्जुन बोले-हे कृष्ण! युद्धक्षेत्रमें डटे हुए
युद्धके अभिलाषी इस स्वजनसमुदायको देखकर
मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा
रहा है तथा मेरे शरीरमें कम्प एवं रोमाञ्च हो रहा
है॥ २८ वेंका उत्तरार्ध और २९ ॥


श्लोक:- गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
अर्थ–हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी
बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा
है; इसलिये मैं खड़ा रहनेको भी समर्थ नहीं हूँ॥ ३० ॥


श्लोक:- निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
अर्थ–हे केशव! मैं लक्षणोंको भी विपरीत ही देख
रहा हूँ तथा युद्धमें स्वजनसमुदायको मारकर कल्याण
भी नहीं देखता॥ ३१ ॥


श्लोक:- नकाङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैजीवितेन वा ॥ अर्थ–हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और
न राज्य तथा सुखोंको ही। हे गोविन्द ! हमें ऐसे
राज्यसे क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगोंसे और
जीवनसे भी क्या लाभ है ? ॥ ३२ ॥


श्लोक:- येषामर्थे काड्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
तइमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
अर्थ–हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि
अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवनकी
आशाको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं ॥ ३३ ॥


श्लोक:- आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुला: श्वशुराः पौत्राः श्याला: सम्बन्धिनस्तथा ॥
अर्थ–गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार
दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी
सम्बन्धी लोग हैं॥ ३४॥


श्लोक:- एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
अर्थ–हे मधुसूदन! मुझे मारनेपर भी अथवा तीनों लोकोंके
राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता;
फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ ३५॥


श्लोक:- निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥
अर्थ–हे जनार्दन ! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियोंको मारकर तो
हमें पाप ही लगेगा ॥ ३६ ॥


श्लोक:- तस्मान्नाह्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
अर्थ–अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्रके
पुत्रोंको मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि अपने
ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? ॥ ३७॥


श्लोक:- यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निरवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्धिर्जनार्दन॥
अर्थ–यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलके नाशसे
उत्पन्न दोषको और मित्रोंसे विरोध करनेमें पापको
नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन ! कुलके नाशसे उत्पन्न
दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके
लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये? ॥ ३८-३९॥


श्लोक:- कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्त्रमधर्मोऽभिभवत्युत॥
अर्थ–कुलके नाशसे सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते
हैं, धर्मके नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप भी
बहुत फैल जाता है॥ ४० ॥

श्लोक:- अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वाष्ण्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥
अर्थ–हे कृष्ण! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ
अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियोंके
दुषित हो जानेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥


श्लोक:- सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
अर्थ–वर्णसंकर कुलघातियोंको और कुलको नरकमें
ले जानेके लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और
जलकी क्रियावाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पणसे वञ्चित
इनके पितरलोग भी अधोगतिको प्राप्त होते हैं॥ ४२॥


श्लोक:- दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
अर्थ–इन वर्णसंकरकारक दोषोंसे कुलघातियोंके सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३॥


श्लोक:- उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥
अर्थ–हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है,
ऐसे मनुष्योंका अनिश्चित कालतक नरकमें वास
होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं॥ ४४॥

श्लोक:- अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
अर्थ–हा! शोक! हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान्
पाप करनेको तैयार हो गये हैं, जो राज्य और
सुखके लोभसे स्वजनोंको मारनेके लिये उद्यत
हो गये हैं ॥ ४५ ॥


श्लोक:- यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
अर्थ–यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवालेको
शस्त्र हाथमें लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र रणमें मार
डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक
कल्याणकारक होगा॥ ४६ ॥

सञ्जय उवाच
श्लोक:- एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्रमानसः ॥ अर्थ–संजय बोले-रणभूमिमें शोकसे उद्विग्न मनवाले
अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुषको
त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गये॥ ४७ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

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